ईंसान कि ईंसानियात, आगें बाढने से पहले आप लोगों को बतां दें, हमारा किसी भी धर्म के बारें ठेस पहुंचाने का ईरादा नहीं है । हमे पाता हैं, कि आप जगें हुये पर थोडासा और जग जायेंगे तो क्या होगा ?  क्योंकि हर ईंसान तो जग के दिन के शुरूआत करता है, और अन्नेकों काम  कर जाता है । ईंसान शरीर से जाग चुंके पर थोडा सा सोच से जाग जाना है । इस लेख मे सभी लोगों के बारें मे नहीं कहा जा रहा, यह उन लोगो के लिये है जो कि शरीर से बडे हो चुके हैं पर दिमाग से बच्चे हैं । 

इंसान कि इंसानियात | क्यों लढते हो धर्म को लेकार
इंसान कि इंसानियात | क्यों लढते हो धर्म को लेकार

जरा हम अपने मन में झँक के देखें, आज से कई वर्षों पहले । जब हमारा ठिक से विकास नहीं हुआ था, हम ठिक से मनुष्य का रुप धारण नहीं किये । हम लोगों मे नहीं किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं था, और न ही किसी के खिलाफ थे । हम लोगो के संबध मे तक में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं पाया जाता था । क्योंकि उस समय ईंसान और उसका मस्तिष्क नादन था  । एक 3 साल से कम उम्र के बच्चों का होती है, बच्चे के मेलमेलाप पर ईंसान का मस्तिष्क था । लढाईयाँ भी होती थी तो अपने पेट के लिये, न ही किसी जाती, धर्म के लिये ।

जैसे जैसे मानव मे समझ आता गया वैसे वैसे मानव एक दूसरे के ऊपार भेदभाव करना शुरू कर दिया, एक दूसरे के खिलाफ बोलना शुरू किया । सबसे ज्यादा ईंसान के ऊपर भेदभाव तब आया, जब ईंसान के बीच मे धर्म का जन्म हुआ । धर्म के जन्म के बाद ईंसानों मे इतना ज्यादा भेदभाव हुआ कि ईंसान, ईंसान को ही मरने लगा, अपने धर्म के रक्षा के लिये, अपने धर्म को बढाने के लिये । कई लोगों का लशे बिछा दी गई धर्म के नाम पर, क्रुसेड (1096 – 1250 ई.) कुल मिलाकर आठ धर्म यूध्द हुय़े, क्रेसेड जैसे अन्नेकों धर्म युध्द हुये जो ईतीहास रचा दि है ।

 कईओं का मनना होगा कि धर्म के जन्म के बाद, या फिर ईंसान के बीच आने के बाद, ईंसान जनवार से ईंसान बना, यह सही है कि ईंसान जनवार से ईंसान बना । जरा सोच लें ईंसान पहले ही ईंसान था, जब वह शरीर से जनवार के रुप मे था ।

इंसान कि इंसानियात | क्यों लढते हो धर्म को लेकार
इंसान कि इंसानियात | क्यों लढते हो धर्म को लेकार

आज ईंसान के बीच मे धर्म के आ जाने का बाद, ईंसान के जींदगी तथा रिलेशनशिप मे तक दरारे ला रही है । दो प्यार करने वाले एक दूसरे का नहीं हो पाते, एक दूसरे को चाहते हुये भी, एक दूसरे के होने के बावजूद भी, एक दूसरे का नहीं हो पाते । अपनी धर्म की रक्षा के लिये, कई  घरों कि खूशीयाँ चाली जाती है । जिंदगी बहुत किमती है, शायद कोई इस दुनिया मे ऐसा होगा जो कि इस खूबशुरात दुनिया मे बिना जिये वैसे ही छोडना चहेगा । हमारी अपनी अपनी जिंदगी है किसी के जिन्दगी उजाड देना अपने आलावा किसी के बस मे नहीं । धर्म के नाम पर लढाईयाँ करना किसी को मरना अच्छाई नहीं बल्कि, किसी को इस खूबशुरात दुनिया मे जिने का हक छिन्ने के बराबर है । जैसे अपने अपने जिन्दगी हमारे लिये किमती है वैसे ही ओरो के लिये भी जिंदगी बहुत किमती है, जितना आप का है उतना ही उनका भी होता है ।

धर्म अपने अपने जगा पर है, धर्म के ऊपर विश्वास करने वाले भी अपने अपने जगा पर हैं । लेकिन धर्म के नाम पर लढने वाले लोग, वे धर्मी नहीं होते, क्योंकि वे सिर्फ नाम का धर्मी कहलाते है, बिना वाजह दंगे करते है ।

हम आखीरी में यहीं कहना चहेंगे कि, हम ईंसान हैं,और ईंसान कि पहनचान ईंसानियात से होती है । हम किसी के धर्म का नाम नहीं लिये, क्योंकि हमारी मकसद किसी भी धर्म को ठेस पहुंचाने का ईरादा नहीं है । न ही धर्म के खिलाफ है, क्योंकि हम भी अन्नेको धर्मो मे से एक धर्म मे आते हैं, बस आप सब को जनकारी प्रदान करना था ।

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